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February 5, 2012

Coming soon - Indian Postal stamps with your picture on it !

Rajesh Kumawat | 10:33 | | Best Blogger Tips

Indian postage stampMumbai, Feb 3: In an effort to make Indian Postal service more attractive and up-to-date with present times, the popular Postal department has decided to offer postal stamps printed with a person's picture on it. 

Assistant Post Master General Shriniwas Vyavahare has been quoted as saying to agencies, "The offering, on first come first serve basis, will be launched in Mumbai during the Kalaghoda Cultural Festival starting Feb 4. Till Feb 11, Mumbaikars can choose from over 17 template designs for printing the stamps with their pictures that can be even used as an official one."

He added, "We had introduced this offering in a New Delhi exhibition last year. Looking at its popularity we organised a similar initiative in Pune last month and are now organising it in Mumbai."

Speaking on the unique idea, Vyavahare said that the stamps can be used for gifting purposes and can have headshots of friends, relatives and family members on the stamps. The 12-stamp sheet can be purchased from the India Post stall at the festival for Rs 300. 
source:Oneindia News 

June 2, 2011

डाक टिकट के बारे में आप कितना जानते है ?

Rajesh Kumawat | 09:17 | | Best Blogger Tips


  • डाक टिकट चिपकने वाले काग़ज़ से बना एक साक्ष्य है जो यह दर्शाता है कि, डाक सेवाओं के शुल्क का भुगतान हो चुका है।
  • आम तौर पर यह एक छोटा आयताकार काग़ज़ का टुकड़ा होता है जो एक लिफाफे पर चिपका रहता है, जो यह यह दर्शाता है कि प्रेषक ने प्राप्तकर्ता को सुपुर्दगी के लिए डाक सेवाओं का पूरी तरह से या आंशिक रूप से भुगतान किया है।
  • डाक टिकट, डाक भुगतान करने का सबसे लोकप्रिय तरीका है; इसके अलावा इसके विकल्प हैं, पूर्व प्रदत्त-डाक लिफाफे, पोस्टकार्ड, हवाई पत्र आदि।
  • डाक टिकटों को डाक घर से ख़रीदा जा सकता है। डाक टिकटों के संग्रह को डाक टिकट संग्रह या फ़िलेटली कहा जाता है। डाक टिकट इकट्ठा करना एक शौक़ है।
फ़िलेटली
सभ्यता के बढ़ते क़दमों के साथ फ़िलेटली मात्र एक भौतिक तथ्य नहीं रहा बल्कि आज फ़िलेटली किसी भी राष्ट्र और राष्ट्र के लोगों, उनकी आस्था व दर्शन, ऐतिहासिकता, संस्कृति, विरासत एवं उनकी आकांक्षाओं व आशाओं का प्रतिबिम्ब और प्रतीक है। जिसके माध्यम से वहाँ के इतिहासकलाविज्ञान, व्यक्तित्व, वनस्पति, जीव-जन्तु, राजनयिक सम्बन्ध एवं जनजीवन से जुडे़ विभिन्न पहलुओं की जानकारी मिलती है। वर्षों से फ़िलेटली महत्त्वपूर्ण घटनाओं के विश्वव्यापी प्रसार, महान विभूतियों को सम्मानित करने एवं प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित करने हेतु कार्य कर रही है। इसने विभिन्न राष्ट्रों के बीच मैत्री की सेतु तैयार करने के साथ-साथ परस्पर एक दूसरे को समझने में सहायता प्रदान की है और आज भी इस दिशा में यह एक मील का पत्थर है। सामान्यतः डाक टिकट एक छोटा सा काग़ज़ का टुकड़ा दिखता है, पर इसका महत्त्व और क़ीमत दोनो ही इससे काफ़ी ज़्य़ादा है। यह मन को मोह लेने वाली जीवन शक्ति से भरपूर है। एक तरफ़ फ़िलेटली के माध्यम से अपनी सभ्यता और संस्कृति के गुजरे वक़्त को आईने में देखा जा सकता है, वहीं डाक टिकट वास्तव में एक नन्हा राजदूत है, जो विभिन्न देशों का भ्रमण करता है एवं उन्हें अपनी सभ्यता, संस्कृति और विरासत से अवगत कराता है। निश्चिततः आज के व्यस्ततम जीवन एवं प्रतिस्पर्धात्मक युग में फ़िलेटली से बढ़कर कोई भी रोचक और ज्ञानवर्द्धक शौक़ नहीं हो सकता। व्यक्तित्व परिमार्जन के साथ-साथ यह ज्ञान के भण्डार में भी वृद्धि करता है।[1]

इतिहास

सबसॆ पहले इंग्लैंड में वर्ष 1840 में डाक-टिकट बेचने की व्यवस्था शुरू की गई। हालाँकि इसके पहले ही डाक वितरण व्यवस्था शुरू हो चुकी थी परंतु पत्र पहुँचाने के लिए पत्र भेजने वाले को पोस्ट ऑफिस तक जाना ही पड़ता था। पहले किसी भी पत्र भेजने वाले को पोस्ट-ऑफिस जाकर पत्र पर पोस्ट मास्टर के दस्तख्त करवाने पड़ते थे पर डाक-टिकटों के बेचे जाने ने इस परेशानी से मुक्ति दिला दी। जब डाक-टिकट बिकने लगे तो लोग उन्हें ख़रीद कर अपने पास रख लेते थे और फिर ज़रूरत पड़ने पर उनका उपयोग कर लेते थे। 1840 में ही सबसे पहले जगह-जगह लेटर-बॉक्स भी टाँगे जाने लगे ताकि पत्र भेजने वाले उनके जरिए पत्र भेज सकें और पोस्ट-ऑफिस जाने से छुट्टी मिल गई। सोचो पहले पत्र भेजने में कितनी तकलीफ आती थी आज पत्र भेजना कितना आसान हो गया है। अब तो संदेश भेजने के लिए पत्र से बहुत तेज़ सुविधाएँ भी हमें उपलब्ध हैं।
विश्व में पहला डाक टिकट आज से डेढ़ सौ साल से पहले ब्रिटेन (इंग्लैंड) में जारी हुआ था। उस समय इंग्लैंड के राजसिंहासन पर महारानी विक्टोरिया विराजमान थीं, इसलिए स्वाभाविक रूप से इंग्लैंड अपने डाक टिकटों पर महारानी विक्टोरिया के चित्रों को प्रमुखता देता रहा। पहले डाक टिकटों पर रानी विक्टोरिया के चित्र छपने के कारण वहाँ की महिलाओं में अपनी रानी के चित्रवाले डाक टिकटों को इकट्ठा करने का जुनून सवार हो गया। ये महिलाएँ ही डाक टिकट संग्रह के शौक़ की जननी बनीं। इंग्लैंड में राजा विलियम प्रथम (सन् 1066-1087) से राजशाही का दौर चला आ रहा है। विश्व का पहला डाक टिकट 1 मई, 1840 को ग्रेट ब्रिटेन में जारी किया गया था, जिसके ऊपर ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया का चित्र छपा था। यह डाक टिकट काले रंग में एक छोटे से चौकोर काग़ज़ पर छपा था और उसकी कीमत एक पेनी रखी गई थी। यह डाक टिकट 'पेनी ब्लैक' के नाम से मशहूर हुआ। एक पेनी मूल्य के इस टिकट के किनारे सीधे थे, यानी टिकटों को अलग करने के लिए जो छोटे छोटे छेद बनाए जाते हैं, वे प्राचीन डाक टिकटों में नहीं थे। इस समय तक उनमें लिफाफे पर चिपकाने के लिए गोंद भी नहीं लगा होता था। यह डाक टिकट हालांकि पहली मई 1840 को बिक्री के लिए जारी किया गया था, लेकिन डाक शुल्क के लिए इसे 6 मई, 1840 से वैध माना गया। ये डाक टिकट विश्व के भी पहले डाक टिकट थे। इंग्लैंड के इन डाक टिकटों को निकालने के श्रेय 'सर रॉलैंड हिल' (सन् 1795-1878) को जाता है। टिकट संग्रह करने में रूचि रखने वालों के लिए इस टिकट का बहुत महत्त्व है, क्योंकि इस टिकट से ही डाक-टिकट संग्रह का इतिहास भी शुरू होता है। इस डाक टिकट की कहानी अत्यंत रोचक है। यहीं से डाक टिकटों की परंपरा शुरू होती है।[2] यदि हम डाक टिकटों के इतिहास का अध्ययन करें तो पेशे से अध्यापक सर रोलैण्ड हिल (सन् 1795-1878) को पहले डाक टिकटों का जनक कहा जाता है। जिस समय पत्रों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने का शुल्क तय किया गया और वह गंतव्य पर लिखा जाने लगा तो उन्हीं दिनों इंग्लैंड के एक स्कूल अध्यापक रोलैण्ड हिल ने देखा कि बहुत से पत्र पाने वालों ने पत्रों को स्वीकार करने से इंकार कर दिया और पत्रों का ढेर लगा हुआ है, जिससे कि सरकारी निधि की क्षति हो रही है। यह सब देख कर उन्होंने सन 1837 में डाक व्यवस्था में सुधार और डाक टिकटों द्वारा डाक शुल्क की वसूली के बारे में दो शोधपत्र (‘पोस्ट आफिस रिफ़ार्म’ नामक पत्र) प्रकाशित किए। इन शोधपत्रों में उन्होंने यह सुझाव दिया कि प्रत्येक आधे औंस के वजन के पत्र पर एक पेनी की समान डाक शुल्क दर लगाई जाए चाहे वह पत्र कितनी ही दूर जाता हो और यह डाक शुल्क पेशगी अदा की जाए। जहां तक डाक शुल्क का भुगतान करने का संबंध है, इस बारे में हिल ने मोहर लगे छोटे-छोटे लेबल जारी करने का सुझाव दिया, ताकि लोग पत्र भेजने के पहले उसे ख़रीदे और पत्र पर चिपका कर अपना पत्र भेजें। लेबल सिर्फ़ इतने बड़े होने चाहिए कि उन पर मुहर लग सके।[2]
गोंद लगे डाक टिकटों का उचित डिजाइन तैयार करने के लिए ब्रिटेन की सरकार ने प्रतियोगिता आयोजित की। इस प्रतियोगिता में 2,600 प्रविष्टियां प्राप्त हुईं लेकिन इनमें से कोई भी डिजाइन उपयुक्त नहीं पाई गई। अंततः हिल ने महारानी के चित्र को डाक टिकट पर छापने का निर्णय किया। इस चित्र के लिए उन्होंने महारानी के उस चित्र को चुना जिसे विलियम वायन ने 1837 में नगर की स्थापना की यादगार के रूप में जारी किए गए मेडल पर अंकित किया था। उन्होंने इसका आकार टैक्स लेबलों पर इस्तेमाल किए जाने वाले चित्रों के आकार जैसा रखा। वायन के मेडल पर अंकित चित्र के आधार पर डाक टिकट तैयार करने के लिए लंदन के हैनरी कारबोल्ड नामक चित्रकार को उसे वाटर कलर पर उतारने के लिए कहा गया। एक पेनी का डाक टिकट काले रंग में और दो पेंस का डाक टिकट नीले रंग में छापा गया। 6 मई 1840 को विश्व का प्रथम डाक टिकट ‘पेनी ब्लैक’ ब्रिटेन द्वारा जारी किया गया। हालांकि, दो पेंस के डाक टिकट 8 मई 1840 तक जारी नहीं हुए। लैटर शीट्स, रैपर्स और लिफाफे आदि डाक स्टेशनरी भी पेनी ब्लैक के साथ-साथ छप कर जारी हुईं। इनमें से मुलरेडी लिफाफे (जिनका नाम इनका डिजाइन बनानेवाले विलियम मुलरेडी के नाम पर रखा गया था) मशहूर हैं। यह डिजाइन काफ़ी मशहूर हुआ लेकिन लिफाफे लोकप्रिय नहीं हुए। पेनी ब्लैक टिकट एक वर्ष से भी कम समय तक प्रयोग में रहा और 1841 में इसका स्थान पेनी रेड टिकट ने ले लिया।[2]
रानी विक्टोरिया के समय में ही इंग्लैंड का विश्व के अधिकतर देशों पर शासन था। इंग्लैंड ही नहीं, बल्कि इंग्लैंड शासित विश्व के अनेक देशों के डाक टिकटों पर इंग्लैंड के शासकों के ही चित्र छपते थे। इससे डाक टिकटों के मध्य डिज़ाइन में अजीब-सी नीरसता भरती चली गई। ये बेहद उबाऊ होते जा रहे थे; लेकिन इंग्लैंड में ही पहली बार जुलाई 1913 में जारी एक डाक टिकट ‘ब्रिटेनिका’ (मूल्य आधा क्राउन) पर आश्चर्यजनक रूप से मध्य डिजाइन में परिवर्तन नज़र आता है। इसके बाद तो टिकटों पर इतिहासभूगोलराजनीति, व्यक्ति, संस्कृति-सभ्यता, साहित्य-विज्ञान, जीव-जंतु, खेल-कूद, स्थापत्य-मूर्ति, चित्र-कलाओं आदि के विविध रंग-रूप देखने को मिलने लगते हैं।

भारत में पहला डाक-टिकट

जहाँ तक भारत का संबंध है, भारत में डाक टिकटों की शुरुआत 1852 में हुई। 1 जुलाई, 1852 को सिन्ध के मुख्य आयुक्त सर बर्टलेफ्र्रोरे द्वारा सिर्फ़ सिंध राज्य में और मुंबई कराची मार्ग पर प्रयोग के लिए ' सिंध डाक (Scinde Dawk)' नामक डाक टिकट जारी किया गया। आधे आने मूल्य के इस टिकट को भूरे काग़ज़ पर लाख की लाल सील चिपका कर जारी किया गया था। यह टिकट बहुत सफल नहीं रहा क्योंकि लाख टूटकर झड़ जाने के कारण इसको संभालकर रखना संभव नहीं था। फिर भी ऐसा अनुमान किया जाता है कि इस टिकट की लगभग 100 प्रतियां विभिन्न संग्रहकर्ताओं के पास सुरक्षित हैं। डाक-टिकटों के इतिहास में इस टिकट को सिंध डाक के नाम से जाना जाता है। बाद में सफ़ेद और नीले रंग के इसी प्रकार के दो टिकट वोव काग़ज़ (Wove Paper) पर जारी किए गए लेकिन इनका प्रयोग बहुत कम दिनों तक रहा, क्योंकि 30 सितंबर 1854 को सिंध प्रांत पर ईस्ट इंडिया कंपनी का अधिकार होने के बाद इन्हें बंद कर दिया गया। ये एशिया के पहले डाक-टिकट तो थे ही, विश्व के पहले गोलाकार टिकट भी थे। संग्रहकर्ता इस प्रकार के टिकटों को महत्त्वपूर्ण समझते हैं और आधे आने मूल्य के इन टिकटों को आज सबसे बहुमूल्य टिकटों में गिनते हैं।[3] बाद में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा भारत के सबसे पहले डाक टिकट आधा आना, एक आना, दो आना और चार आना के चार मूल्यों में 1 अक्टूबर 1854 में जारी किये गए जिस पर महारानी विक्टोरिया के चित्र छपे थे। यह डाक टिकटों को लिथोग्राफी पद्धति द्वारा मुद्रित किया गया था। भारत में सन् 1854 से 1931 तक डाक टिकटों पर रानी विक्टोरिया, राजा एडवर्ड सप्तम, जॉर्ज पंचम, जार्ज छठे के चित्रवाले डाक टिकट ही निकलते रहे हैं। अपने प्रेम के लिए सिंहासन त्यागने वाले राजा एडवर्ड अष्टम (सन् 1936) पर यहाँ कोई डाक टिकट नहीं निकला था। 1926 में इण्डिया सिक्यूरिटी प्रेस नासिक में डाक टिकटों की छपाई आरम्भ होने पर 1931 में प्रथम चित्रात्मक डाक टिकट नई दिल्ली के उद्घाटन पर जारी किया गया। 1935 में ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम की रजत जयन्ती के अवसर पर प्रथम स्मारक डाक टिकट जारी किया गया। स्वतन्त्रता पश्चात 21 नवम्बर 1947 को प्रथम भारतीय डाक टिकट साढे़ तीन आने का ‘जयहिन्द’ जारी किया गया। 21 फ़रवरी 1911 को विश्व की प्रथम एयरमेल सेवा भारत द्वारा इलाहाबाद से नैनी के बीच आरम्भ की गयी। राष्ट्रमण्डल देशों में भारत पहला देश है जिसने सन 1929 में हवाई डाक टिकट का विशेष सेट जारी किया।

फ़िलेटली अर्थात डाक टिकटों का संग्रह

'डाक टिकटों का व्यवस्थित संग्रह' अर्थात ‘फ़िलेटली‘ मानव के लोकप्रिय शौक़ों में से एक है। ‘शौक़ों का राजा‘ और ‘राजाओं का शौक़‘ कहे जाने वाली इस विधा ने आज सामान्य जनजीवन में भी उतनी ही लोकप्रियता प्राप्त कर ली है। सामान्यतः डाक टिकटों का संग्रह ही फ़िलेटली माना जाता है पर बदलते वक़्त के साथ फ़िलेटली डाक टिकटों, प्रथम दिवस आवरण, विशेष आवरण, पोस्ट मार्क, डाक स्टेशनरी एवं डाक सेवाओं से सम्बन्धित साहित्य का व्यवस्थित संग्रह एवं अध्ययन बन गया है। रंग-बिरंगे डाक टिकटों में निहित सौन्दर्य जहाँ इसका कलात्मक पक्ष है, वहीं इसका व्यवस्थित अध्ययन इसके वैज्ञानिक पक्ष को प्रदर्शित करता है। डाक टिकट संग्रह के सम्बन्ध में एक प्रसिद्ध संस्मरण भी है कि इंग्लैण्ड के भूतपूर्व सम्राट जार्ज पंचम को किसी डाक टिकट विक्रेता के यहाँ से डाक टिकट ख़रीदते उनके रिश्तेदार ने देख लिया और इसकी शिकायत उनकी पत्नी महारानी मेरी से की। इसके उत्तर में महारानी मेरी ने कहा ' मुझे पता है कि मेरे पति शौक़ हेतु डाक टिकट ख़रीदते हैं और यह अच्छा भी है, क्योंकि यह शौक़ उन्हें अन्य बुरी प्रवृतियों से दूर रखता है।’ नोबेल पुरस्कार प्राप्त प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी अर्नेस्ट रदरफोर्ड ने कहा था कि All Science is either physics or stamp collecting.’
‘फ़िलेटली’ शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द ‘फ़िलोस’ व ‘एटलिया’ से हुई। सन 1864 में 24 वर्षीय फ्रांसीसी व्यक्ति जार्ज हॉर्पिन ने ‘फ़िलेटली’ शब्द का इजाद किया। इससे पूर्व इस विधा को ‘टिम्बरोलॉजी’ नाम से जाना जाता था। फ्रेंच भाषा में टिम्बर का अर्थ टिकट होता है। एडवर्ड लुइन्स पेम्बर्टन को ‘साइन्टिफिक फ़िलेटली’ का जनक माना जाता है। फ़िलेटली अर्थात डाक-टिकटों के संग्रह की भी एक रोचक कहानी है। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में यूरोप में एक अंग्रेज़ महिला को अपने श्रृंगार-कक्ष की दीवारों को डाक टिकटों से सजाने की सूझी और इस हेतु उसने सोलह हज़ार डाक-टिकट परिचितों से एकत्र किए और शेष हेतु सन 1841 में ‘टाइम्स ऑफ लंदन’ समाचार पत्र में विज्ञापन देकर पाठकों से इस्तेमाल किए जा चुके डाक टिकटों को भेजने की प्रार्थना की। तब से डाक-टिकटों का संग्रह एक शौक़ के रूप में परवान चढ़ता गया। [1] दुनिया में डाक टिकटों का प्रथम एलबम 1862 में फ्रांस में जारी किया गया। आज विश्व में डाक-टिकटों का सबसे बड़ा संग्रह ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के पास है। भारत में भी क़रीब पचास लाख लोग व्यवस्थित रूप से डाक-टिकटों का संग्रह करते हैं। भारत में डाक टिकट संग्रह को बढ़ावा देने के लिए प्रथम बार सन् 1954 में प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय डाक टिकट प्रदर्शनी का आयोजन किया गया । उसके पश्चात से अनेक राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय प्रदर्शनियों का आयोजन होता रहा है। वस्तुतः इन प्रदर्शनियों के द्वारा जहाँ अनेक समृद्ध संस्कृतियों वाले भारत राष्ट्र की गौरवशाली परम्परा को डाक टिकटों के द्वारा चित्रित करके विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सन्देशों को प्रसारित किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ़ यह विभिन्न राष्ट्रों के मध्य सद्भावना एवम् मित्रता में उत्साहजनक वृद्धि का परिचायक है। इसी परम्परा में भारतीय डाक विभाग द्वारा 1968 में डाक भवन नई दिल्ली में ‘राष्ट्रीय फ़िलेटली संग्रहालय’ की स्थापना की और 1969 में मुम्बई में प्रथम फ़िलेटलिक ब्यूरो की स्थापना की गई। डाक टिकटों के अलावा मिनिएचर शीट, सोवीनियर शीट, स्टैम्प शीटलैट, स्टैम्प बुकलैट, कलैक्टर्स पैक व थीमेटिक पैक के माध्यम से भी डाक टिकट संग्रह को रोचक बनाने का प्रयास किया गया है। [1]
एक रोचक घटनाक्रम में सन् 1965 में एक सोलह वर्षीय किशोर ने ग़रीबी ख़त्म करने हेतु अमेरिका के पोस्टमास्टर जनरल को सुझाव भेजा कि कुछ डाक-टिकट जानबूझ कर ग़लतियों के साथ छापे जायें और उनको ग़रीबों को पाँच-पाँच सेण्ट में बेच दिया जाय। ये ग़रीब इन टिकटों को संग्रहकर्ताओं को मुँहमाँगी क़ीमतों पर बेचकर अपना जीवन सुधार सकेंगे। एक ब्रिटिश कहावत भी है- ‘फ़िलेटली टिकट एक ऐसे शेयर की भाँति हैं, जिनके मूल्य में कभी गिरावट नहीं आती वरन् वृद्धि ही होती है।’ आज फ़िलेटली मात्र एक सुनहरा अतीत नहीं है, वरन् लोगों के सांस्कृतिक लगाव, विविधता एवं सुरूचिपूर्ण चयन का भी परिचायक है। रंग-बिरंगे डाक टिकटों का संग्रह करने वाले लोग जहाँ इस शौक़ के माध्यम से परस्पर मित्रता में बँधकर सम्बन्धों को नया आयाम देते हैं वहीं इसके व्यवहारिक पहलुओं का भी बख़ूबी इस्तेमाल करते हैं। मसलन रंग-बिरंगे टिकटों से जहाँ ख़ूबसूरत ग्रीटिंग कार्ड बनाये जा सकते हैं वहीं इनकी ख़ूबसूरती को फ्रेम में भी क़ैद किया जा सकता है। बचपन से ही बच्चों को फ़िलेटली के प्रति उत्साहित कर उनको अपनी संस्कृति, विरासत एवम् जनजीवन से जुडे अन्य पहलुओं के बारे में मनोरंजक रूप से बताया जा सकता है। डाक विभाग वर्ष भर में जारी सभी टिकटों अथवा किसी थीम विशेष के डाक टिकटों को समेटकर एक विशेष ‘स्टैम्प कलेक्टर्स पैक’ जारी करता है जो आज की विविधतापूर्ण दुनिया में एक अनूठा उपहार है। इसी प्रकार यदि कोई अपने किसी ख़ास को सरप्राइज गिफ़्ट देना चाहता है, तो न्यूनतम दो सौ रुपये से उसके नाम फ़िलेटली जमा खाता खोल सकता है। डाक विभाग देय मूल्य के बराबर रंगीन डाक टिकट, प्रथम दिवस आवरण और विवरणिका उस व्यक्ति विशेष के पते पर हर माह बिना किसी अतिरिक्त मूल्य के पहुँचाता है। वह दोस्त भी अचरज में पड़ जायेगा कि उस पर इतनी ख़ूबसूरत मेहरबानी करने वाला शख़्स कौन हो सकता है। और तो और, डाक-विभाग द्वारा सन् 1999 से प्रति वर्ष आयोजित ‘डाक टिकट डिजाइन प्रतियोगिता’ के विजेता की डिज़ाइन को अगले बाल-दिवस पर डाक-टिकट के रूप में जारी किया जाता है। इसी प्रकार 1998 से आयोजित ‘डाक टिकट लोकप्रियता मतदान’ में प्रति वर्ष भाग लेकर सर्वोत्तम डाक टिकटों का चुनाव किया जा सकता है। डाक विभाग द्वारा डाक टिकटों के साथ ही मिनिएचर- शीट्स भी जारी की जाती है। इसमें चार डाक टिकटों की शृंखला एक साथ जारी होती है। एक ही शीट पर चार अलग-अलग डाक टिकट जुड़े होते हैं। यह शीट टिकट संग्रहकर्ताओं के लिए ही विशेष रूप से जारी की जाती है। [1]

डाक टिकट और जानकारी

सुंदर और उपयोगी वस्तुओं का संग्रह मानव का स्वभाव है। हर चीज़ को संग्रह करने में मज़ा है और हर एक चीज़ के संग्रह के साथ कुछ न कुछ ज्ञान प्राप्त होता है लेकिन डाक टिकटों के संग्रह का मज़ा कुछ और ही है। हर डाक टिकट किसी न किसी विषय की जानकारी देता है, उसके पीछे कोई न कोई जानकारी ज़रूर छुपी होती है। अगर हम इस छुपी हुई कहानी को खोज सकें तो यह हमारी सामने ज्ञान की रहस्यमय दुनिया का नया पन्ना खोल देता है। इसीलिए तो डाक टिकटों का संग्रह विश्व के सबसे लोकप्रिय शौक़ में से एक है। डाक-टिकटों का संग्रह हमें स्वाभाविक रूप से सीखने को प्रेरित करता है, इसलिए इसे प्राकृतिक शिक्षा-उपकरण कहा जाता है। डाक-टिकट किसी भी देश की विरासत की चित्रमय कहानी हैं। डाक टिकटों का एक संग्रह विश्वकोश की तरह है, जिसके द्वारा हम अनेक देशों केइतिहासभूगोलसंस्कृति, ऎतिहासिक घटनाएं, भाषाएं, मुद्राएं, पशु-पक्षी, वनस्पतियों और लोगों की जीवनशैली एवं देश के महारथियों के बारे में बहुत सारी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। समय के साथ जैसे-जैसे टिकटों का प्रचलन बढ़ा टिकट संग्रह का शौक़ भी पनपने लगा। 1860 से 1880 के बीच बच्चों और किशोरों ने टिकटों का संग्रह करना शुरू कर दिया था। दूसरी ओर अनेक वयस्क लोगों में भी यह शौक़ पनपने लगा और उन्होंने टिकटों को जमा करना शुरू किया, संरक्षित किया, उनके रेकार्ड रखे और उन पर शोध आलेख प्रकाशित किए। जल्दी ही इन संरक्षित टिकटों का मूल्य बढ़ गया क्योंकि इनमें से कुछ तो ऎतिहासिक विरासत बन गए थे और बहुमूल्य बन गए थे। ग्रेट ब्रिटेन के बाद अन्य कई देशों द्वारा डाक-टिकट जारी किये गए।
1920 तक यह टिकट संग्रह का शौक़ आम जनता तक पहुंचने लगा। उनको अनुपलब्ध तथा बहुमूल्य टिकटों की जानकारी होने लगी और लोग टिकट संभालकर रखने लगे। नया टिकट जारी होता तो उसे ख़रीदने के लिए डाकघर पर भीड़ लगनी शुरू हो जाती थी। लगभग 50 वर्षो तक इस शौक़ का नशा जारी रहा। इसी समय टिकट संग्रह के शौक़ पर आधारित टिकट भी जारी किए गए। जर्मनी के टिकट में टिकटों के शौक़ीन एक व्यक्ति को टिकट पर अंकित बारीक अक्षर आवर्धक लेंस (मैग्नीफाइंग ग्लास) की सहायता से पढ़ते हुए दिखाया गया है। आवर्धक लेंस टिकट-संग्रहकर्ताओं का एक महत्त्वपूर्ण उपकरण है। यही कारण है कि अनेक डाक टिकटों के संग्रह से संबंधित डाक टिकटों में इसे दिखाया जाता है। हरे रंग के 8 सेंट के टिकट को अमेरिका के डाक टिकटों की 125वीं वर्षगाँठ के अवसर पर 1972 में जारी किया गया था। 1 रुपये मूल्य के डाक टिकट को 1970 में भारत की राष्ट्रीय डाक टिकट प्रदर्शनी के अवसर पर जारी किया गया था। इसी प्रकार बांग्लादेश के तिकोने टिकटों का जोड़ा 1984 में पहली बांग्लादेश डाक टिकट प्रदर्शनी के अवसर पर जारी किया गया था । कभी कभी डाक टिकटों के साथ कुछ मनोरंजक बातें भी जुड़ी होती हैं। उदाहरण के लिए यू एस के टिकट में यू एस का ही एक और टिकट तथा भारत के टिकट में भारत का ही एक और टिकट प्रदर्शित किया गया है। जब की यू एस के टिकट में दिखाए गए दोनों टिकट स्वीडन के है। इस प्रकार के मनोरंजक तथ्य डाक टिकटों के संग्रह को और भी मनोरंजक बनाते हैं।

1940-50 तक डाक-टिकटों के शौक़ ने देश-विदेश के लोगों को मिलाना शुरू कर दिया था। टिकट इकट्ठा करने के लिए लोग पत्र-मित्र बनाते थे। अपने देश के डाक-टिकटों को दूसरे देश के मित्रों को भेजते थे और दूसरे देश के डाक टिकट मंगवाते थे। पत्र-मित्रता के इस शौक़ से डाक-टिकटों का आदान प्रदान तो होता ही था लोग विभिन्न देशों के विषय में अनेक ऎसी बातें भी जानते थे, जो किताबों में नहीं लिखी होती हैं। उस समय टीवी और आवागमन के साधन आम न होने के कारण देश विदेश की जानकारी का ये बहुत ही रोचक साधन बने। पत्र-पत्रिकाओं में टिकट से संबंधित स्तंभ होते और इनके विषय में बहुत सी जानकारियों को जन सामान्य तक पहुंचाया जाता। पत्र-मित्रों के पतों की लंबी सूचियां भी उस समय की पत्रिकाओं में प्रकाशित की जाती थीं। धीरे धीरे डाक टिकटों के संग्रह की विभिन्न शैलियों का भी जन्म हुआ। लोग इसे अपनी जीवन शैली, परिस्थितियों और रूचि के अनुसार अनुकूलित करने लगे। इस परंपरा के अनुसार कुछ लोग एक देश या महाद्वीप के डाक-टिकट संग्रह करने लगे तो कुछ एक विषय से संबंधित डाक-टिकट। आज अनेक लोग इस प्रकार की शैलियों का अनुकरण करते हुए और अपनी-अपनी पसंद के किसी विशेष विषय के डाक टिकटों का संग्रह करके आनंद उठाते हैं। विषयों से संबंधित डाक टिकटों के संग्रह में अधिकांश लोग पशुपक्षीफलफूल, तितलियां, खेलकूद, महात्मा गांधी, महानुभावों, पुल, इमारतें आदि विषयों और दुनिया भर की घटनाओं के रंगीन और सुंदर चित्रों से सजे डाक टिकटों को एकत्रित करना पसंद करते हैं। प्रत्येक देश हर साल भिन्न भिन्न विषयों पर डाक-टिकट जारी करते हैं और जानकारी का बड़ा ख़ज़ाना विश्व को सौप देते हैं। इस प्रकार किसी विषय में गहरी जानकारी प्राप्त करने के लिए उस विषय के डाक टिकटों का संग्रह करना एक रोचक अनुभव हो सकता है। डाक-टिकट संग्रह का शौक़ हर उम्र के लोगों को मनोरंजन प्रदान करता है। बचपन में ज्ञान एवं मनोरंजन, वयस्कों में आनंद और तनाव मुक्ति तथा बड़ी उम्र में दिमाग को सक्रियता प्रदान करने वाला इससे रोचक कोई शौक़ नहीं। इस तरह सभी पीढियों के लिए डाक टिकटों का संग्रह एक प्रेरक और लाभप्रद अभिरूचि है।

डाक टिकटों के प्रकार

सामान्यतः लोग डाक विभाग द्वारा जारी नियत डाक टिकटों के बारे में ही जानते हैं। ये डाक टिकट विशेष रूप से दिन-प्रतिदिन की डाक-आवश्यकताओं के लिए जारी किए जाते हैं और असीमित अवधि के लिए विक्रय हेतु रखे जाते हैं। पर इसके अलावा डाक विभाग किसी घटना, संस्थान, विषय-वस्तु, वनस्पति व जीव-जन्तु तथा विभूतियों के स्मरण में भी डाक टिकट भी जारी करता है, जिन्हें स्मारक / विशेष डाक टिकट कहा जाता है। सामान्यतया ये सीमित संख्या में मुद्रित किये जाते हैं और फ़िलेटलिक ब्यूरो / काउन्टर / प्राधिकृत डाकघरों से सीमित अवधि के लिये ही बेचे जाते हैं। नियत डाक टिकटों के विपरीत ये केवल एक बार मुद्रित किये जाते हैं ताकि पूरे विश्व में चल रही प्रथा के अनुसार संग्रहणीय वस्तु के तौर पर इनका मूल्य सुनिश्चित हो सके। परन्तु ये वर्तमान डाक टिकटों का अतिक्रमण नहीं करते और सामान्यतया इन्हें डाक टिकट संग्राहकों द्वारा अपने अपने संग्रह के लिए ख़रीदा जाता है। इन स्मारक / विशेष डाक टिकटों के साथ एक ‘सूचना विवरणिका’ एवं ‘प्रथम दिवस आवरण’ के रूप में एक चित्रात्मक लिफाफा भी जारी किया जाता है। इसके अलावा डाक विभाग विशेष प्रकार की ‘सोवयूनीर-शीटस’ भी जारी करता है, जिसमें एक ही सीरीज़ के या बहुधा विभिन्न डिज़ाइन के डाक टिकटों का संग्रह होता है। डाक टिकट संग्राहक प्रथम दिवस आवरण पर लगे डाक टिकट को उसी दिन एक विशेष मुहर से विरूपित करवाते हैं। इस मुहर पर टिकट के जारी होने की तारीख और स्थान अंकित होता है। जहाँ नियमित डाक टिकटों की छपाई बार-बार होती है, वहीं स्मारक डाक टिकट सिर्फ़ एक बार छपते हैं। यही कारण है कि वक़्त बीतने के साथ अपनी दुर्लभता के चलते वे काफ़ी मूल्यवान हो जाते हैं।[4] भारत में सन् 1852 में जारी प्रथम डाक टिकट (आधे आने का सिंदे डाक) की क़ीमत आज क़रीब ढाई लाख रुपये आँकी जाती है। कभी-कभी कुछ डाक टिकट डिज़ाइन में गड़बड़ी पाये जाने पर बाज़ार से वापस ले किये जाते हैं, ऐसे में उन दुर्लभ डाक टिकटों को फ़िलेटलिस्ट मुँहमाँगी रक़म पर ख़रीदने को तैयार होते हैं।

अनोखे डाक टिकट

विश्व का सबसे मँहगा और दुर्लभतम डाक-टिकट ब्रिटिश गुयाना द्वारा सन् 1856 में जारी किया गया एक सेण्ट का डाक-टिकट है। गुलाबी काग़ज़ पर काले रंग में छपे, विश्व में एकमात्र उपलब्ध इस डाक-टिकट को ब्रिटिश गुयाना के डेमेरैरा नामक नगर में सन् 1873 में एक अँगरेज़ बालक एल. वॉघान ने रद्दी में पाया और छः शिलिंग में नील मिककिनॉन नामक संग्रहकर्ता को बेच दिया । अन्ततः कई हाथों से गुज़रते हुए इस डाक-टिकट को न्यूयार्क की रॉबर्ट सैगल ऑक्शन गैलेरीज इन्क द्वारा सन् 1981 में 9,35,000 अमेरिकी डॉलर ( लगभग चार करोड़ रुपये) में नीलाम कर दिया गया। ख़रीददार का नाम अभी भी गुप्त रखा गया है, क्योंकि विश्व के इस दुर्लभतम डाक टिकट हेतु उसकी हत्या भी की जा सकती है। इसी प्रकार भारत के डाक टिकटों में भी सन् 1854 में जारी चार आने वाले लिथोग्राफ में एक शीट पर महारानी विक्टोरिया का सिर टिकटों में उल्टा छप गया, इस त्रुटि के चलते इसकी क़ीमत आज पाँच लाख रुपये से भी अधिक है। इस प्रकार के कुल चौदह-पन्द्रह त्रुटिपूर्ण डाक टिकट ही अब उपलब्ध हैं। स्वतंत्रता के बाद सन् 1948 में महात्मा गाँधी पर डेढ़ आना, साढे़ तीन आना, बारह आना और दस रू. के मूल्यों में जारी डाक टिकटों पर तत्कालीन गर्वनर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने गवर्नमेण्ट हाउस में सरकारी काम में प्रयुक्त करने हेतु ‘सर्विस’ शब्द छपवा दिया। इन आलोचनाओं के बाद कि किसी की स्मृति में जारी डाक टिकटों के ऊपर ‘सर्विस’ नहीं छापा जाता, उन टिकटों को तुरन्त नष्ट कर दिया गया। पर इन दो-तीन दिनों में जारी सर्विस छपे चार डाक टिकटों के सेट का मूल्य आज तीन लाख रुपये से अधिक है। एक घटनाक्रम में ब्रिटेन के न्यू ब्रेंजविक राज्य के पोस्टमास्टर जनरल ने डाक टिकट पर स्वयं अपना चित्र छपवा दिया। ब्रिटेन में डाक टिकटों पर सिर्फ़ वहाँ के राजा और रानी के चित्र छपते हैं, ऐसे में तत्कालीन महारानी विक्टोरिया ने यह तथ्य संज्ञान में आते ही डाक टिकटों की छपाई रूकवा दी पर तब तक पचास डाक टिकट जारी होकर बिक चुके थे। फलस्वरूप दुर्लभता के चलते इन डाक टिकटों की क़ीमत आज लाखों में है।
कई देशों ने तो डाक टिकटों के क्षेत्र में नित नये अनूठे प्रयोग करने की पहल की है। स्विटजरलैण्ड द्वारा जारी एक डाक-टिकट से चॉकलेट की खुशबू आती है तो भूटान ने त्रिआयामी, उभरे हुये रिलीफ टिकट, इस्पात की पतली पन्नियों, रेशम, प्लास्टिक और सोने की चमकदार पन्नियों वाले डाक टिकट भी जारी किये हैं। यही नहीं, भूटान ने सुगन्धित और बोलने वाले (छोटे रिकार्ड के रूप में) डाक टिकट भी निकालकर अपना सिक्का जमाया है। सन् 1996 में विश्व के प्रथम डाक टिकट ‘पेनी ब्लैक’ के सम्मान में भूटान ने 140 न्यू मूल्य वर्ग में 22 कैरेट सोने के घोल के उपयोग वाला डाक टिकट जारी किया था, जो अब दुलर्भ टिकटों की श्रेणी में आता है।
10 अक्टूबर 1985 को भारतीय डाक विभाग ने अपना प्रथम त्रिकोणीय डाक टिकट जारी किया तो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की शताब्दी पर 28 दिसम्बर 1985 को एक ऐसा डाक टिकट जारी किया जिसमें कुल 61 विभूतियों के चित्र अंकित हैं। 20 अगस्त 1991 को भारतीय डाक विभाग ने अब तक का सबसे बड़ा डाक टिकट पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी पर जारी किया। भारतीय डाक विभाग ने 13 दिसम्बर 2006 को चन्दन, 7 फ़रवरी 2007 को गुलाब और 26 अप्रैल 2008 को जूही की ख़ुशबू वाले सुगंधित डाक टिकट जारी किये हैं, जो कि साल भर तक सुगन्धित रहेंगे। भारत से पहले मात्र चार देशों ने सुगन्धित डाक टिकट जारी किये हैं। इनमें स्विटजरलैण्ड, थाईलैण्ड व न्यूजीलैण्ड ने क्रमशः चाकलेट, गुलाब व जैस्मीन की सुगन्ध वाले डाक टिकट जारी किये हैं तो भूटान ने भी सुगन्धित डाक टिकट जारी किये हैं।

डाक टिकट संग्रह हेतु ज़रूरी बातें

आज विश्व के तमाम देशों द्वारा विभिन्न विषय वस्तुओं पर डाक टिकट जारी किये जा रहे हैं। सभी डाक टिकटों का संकलन न तो सम्भव है व न ही व्यावहारिक ही। डाक टिकट संग्रह हेतु ज़रूरी है कि किसी ख़ास विषयवस्तु में या ख़ास देश या क्षेत्र के डाक टिकट संग्रह करने में अपनी रूचि के अनुसार संग्रह किया जाय। डाक टिकट संग्रह का सबसे आसान तरीका प्राप्त पत्रों पर लगे डाक टिकट हैं, जिनकी अपने मित्रों से अदला-बदली भी की जा सकती है। आवरण पर से डाक टिकट को उखाड़ने या छीलने की कोशिश न करें, वरन् लिफाफे से टिकट वाला हिस्सा थोड़ा हाशिया देकर काट लें। डाक टिकटों को सहेज कर रखने हेतु बाज़ार में एलबम भी मिलते हैं। डाक टिकटों को एलबम में लगाने हेतु क़ब्ज़ा व चिमटी का प्रयोग करना चाहिए। डाक टिकट के आरोपण में गोंद का प्रयोग न करें क्योंकि गोंद हमेशा के लिये आपके डाक टिकटों को क्षतिग्रस्त कर देगा। कब्जे (कार्नस) छोटे पतले काग़ज़ के बने होते हैं जिनके एक ओर गोंद लगा होता है। डाक टिकट को पकड़ने के लिए चिमटी का इस्तेमाल करें, अंगुलियों से डाक टिकट मैला हो जाने की संभावना रहती है।
डाक-टिकटों का आरोपण करने से पहले अपने संग्रह को छाँट लें। क्षतिग्रस्त टिकटों को निकाल फेंकने में संकोच नहीं करें। अच्छे डाक-टिकटों को ठण्डे पानी के बर्तन में रखें और कुछ मिनटों के बाद काग़ज़ से धीरे-धीरे अलग कर लें। भिगोते समय कुछ डाक-टिकटों पर स्याही फैल सकती है, ऐसे डाक-टिकटों को अलग से भिगोना चाहिये। छुड़ाए गये डाक-टिकटों को चिमटी से उठा लें और उन्हें साफ काग़ज़ पर मुँह के बल सूखने के लिये रख दें। जैसे-जैसे वे सूखेंगे, कभी-कभी उनमें संकुचन आता जायेगा। सूखने के बाद उन्हें एक पुस्तक में कुछ घण्टों के लिये रख दें। अपने डाक-टिकटों को छाँट लंे और जैसे आप आरोपण करना चाहते हैं वैसे ही पृष्ठों पर लगा दें। क़ब्ज़ा का क़रीब एक तिहाई हिस्सा मोड़ लें और उसकी नोक को भिगों लें व इसे डाक-टिकट की पीठ पर जोड़ दें। डाक-टिकट पर क़ब्ज़ा जड़ने के बाद कब्जे के दूसरे ओर को हल्का से भिगो दें और डाक-टिकट को पृष्ठ के उचित ‘एलबम’ के पृष्ठ ग्राफ-पेपर, जो समान छोटे-छोटे वर्गों में विभक्त होते हैं पर आप डाक-टिकटों को आसानी से अंतर पर रख सकते हैं। प्रत्येक टिकट पर एक छोटा सा विवरण भी लिखना अच्छा होगा। डाक-टिकटों के संग्रह के लिये विवरण तैयार करना इस शौक़ का बड़ा ही आनन्ददायी पहलू है। विवरण में डाक टिकट के जारी होने की तारीख, अवसर और कलाकार का नाम इत्यादि लिखा जा सकता है। खाका तैयार करने में यह ध्यान रखें कि पृष्ठ डाक-टिकट से या विवरण से ज़्यादा भर न जाएँ । दोनों का संतुलन रहना चाहिये।

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